काशी विश्वनाथ मंदिर हिन्दुओं का सबसे प्रशिध मंदिरों में एक है और इसे भगवान शिव के १२ दिव्य ज्योतिर्लिंगों में से एक माना जाता है | ब्रह्माण्ड पर शासन करने वाले को विश्वनाथ और बनारस के पुराने नाम काशी को जोड़कर इसका नाम काशी विश्वनाथ दिया गया |

ऐसा माना जाता है कि एक बार इस मंदिर के दर्शन करने और पवित्र गंगा में स्‍नान कर लेने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आदि शंकराचार्य, सन्त एकनाथ रामकृष्ण परमहंस, स्‍वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद, गोस्‍वामी तुलसीदास सभी का आगमन हुआ हैं। यहिपर सन्त एकनाथजीने वारकरी सम्प्रदायका महान ग्रन्थ श्रीएकनाथी भागवत लिखकर पुरा किया और काशिनरेश तथा विद्वतजनोद्वारा उस ग्रन्थ कि हाथी पर से शोभायात्रा खुब धुमधामसे निकाली गयी।महाशिवरात्रि की मध्य रात्रि में प्रमुख मंदिरों से भव्य शोभा यात्रा ढोल नगाड़े इत्यादि के साथ बाबा विश्वनाथ जी के मंदिर तक जाती है।

हिन्दू मान्यता के अनुसार काशी भगवान शिव के त्रिशूल पर बसा है और यहाँ मंदिर के दर्शन और गंगा स्नान से मनुष्य मोक्ष प्राप्ति कर लेता है |

काशी विश्वनाथ मन्दिर का इतिहास

बनारस का प्रमुख विश्वनाथ मंदिर बहुत छोटा था0 और लगभग 17वीं शताब्दी में इंदौर की रानी अहिल्याबाई होल्कर ने इसे सुंदर स्वरूप प्रदान किया और इस मंदिर को बृहद रूप दिया और कहा जाता है कि एक बार रानी अहिल्या बाई होलकर के स्वप्न में भगवान शिव को देखा और वे भगवान शिव की भक्त होने के कारन 1777 में इस मंदिर का निर्माण कराया | सिख राजा रंजीत सिंह ने 1835 ई. में मंदिर का शिखर सोने से मढ़वा दिया तभी से इस मंदिर को गोल्डेन टेम्पल ( स्वर्ण मंदिर )नाम से भी पुकारा जाता है। यह मंदिर बहुत बार ध्वस्त हुआ और आज जो मंदिर है उसका निर्माण चौथी बार हुआ है। 1585 ई. में बनारस से आए मशहूर व्यापारी टोडरमल ने इस मंदिर का निर्माण करवाया और 1669 ई. में जब औरंगजेब का शासन काल तब भी इस मंदिर को बहुत हानि पहुँचाया गया।

मंदिर संरचना

गंगा तट पर सँकरी विश्वनाथ गली में स्थित विश्वनाथ मंदिर कई मंदिरों और पीठों से घिरा हुआ है और यहाँ पर एक कुआँ भी है, जिसे ‘ज्ञानवापी’ की संज्ञा दी जाती है, जो मंदिर के उत्तर में स्थित है। विश्वनाथ मंदिर के अंदर एक मंडप व गर्भगृह विद्यमान है। गर्भगृह के भीतर चाँदी से मढ़ा भगवान विश्वनाथ का 60 सेंटीमीटर ऊँचा शिवलिंग विद्यमान है। यह शिवलिंग काले पत्थर से निर्मित है। हालाँकि मंदिर का भीतरी परिसर इतना इतना व्यापक नहीं है, परंतु वातावरण पूरी तरह से शिवमय है।

 

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